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ashish
  • 13th Dec 18

  • By Ashish Dubey

ज़िद्द एक छोटा सा शब्द है, पर कभी कभी ये इतना बड़ा हो जाता है की आपकी पूरी ज़िंदगी बदल देता है| हमने असली ज़िंदगी में और फिल्मों में, किससे कहानियो में और किताबों में अक्सर ज़िद्द को जीतते देखा है|

सबके जीवन में एक ऐसा समय आता है जब हमें ज़िद्द करनी होती है, ज़िद्दी बनना पड़ता है, और करनी पड़ती है ज़िद्द अपने आप से|

मेरा वास्ता भी ज़िद्द से हो चूका है, और यही मेरी ज़िद्द की कहानी है| मेरी कहानी में बहुत बड़ी कामयाबी के किससे नही है| पर मेरे लिए मेरी कहानी का सीधा असर मेरे आज के जीवन पर नज़र आता है|

साधारण ज़िंदगी सफर करने वाले परिवार में मेरा जन्म हुआ| और हर माता पिता की तरह मेरे घर वालों ने मेरे लिए कुछ सपने संजोए होते हैं…उनकी उम्मीद पे हर बार मैं खरा नही उतरा…वह चाहते थे की मैं पढ़ु… पर मेरा कहाँ ध्यान था पढ़ाई में… अच्छा तो नही लग रहा बताने में, पर मैं स्कूल में काफ़ी बार फेल हुआ… और कॉलेज में भी बहुत मुश्किल आई… पढ़ाई मेरे लिए और मैं उसके लिए नही बना था… मेरे कारण, मेरे घर वाले भी शर्मिंदा होते रहे और मैं भी… मैं शायद, शर्मिंदा कम और गुस्सा ज़्यादा था… क्या डिग्री ही सब कुछ होती है

और कुछ नही बन पड़ा तो बिज़्नेस किया, पर अभी इम्तिहान बाकी था.. उसमें भी फेल हो गया…कोई कहता पड़े लिखे होते तो बिज़्नेस भी संभाल लेते…

सबको लगता था की "I am a big looser…" और कभी कभी मुझे भी| मैने बहुत रातें जाग जाग के काटी हैं, यही सोचते सोचते की क्या सच में मैं लूसर हूँ| बहुत शक किया मैने अपनी काबिलियत पर|

यूँ ही चारपाई पे पड़े, अपनी ज़िंदगी की कशमकश में खोया रहता था| एक दिन, जब मेरे कानो में ये शब्द गूँजे, "वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां हम अभी से क्या बताए क्या हमारे दिल में है " यह शब्द, ऐसे लगा जैसे रेडियो से किसी ने तीर छोड़ा हो जो सीधा मेरे दिल को चीर गया… उस रात मैं बिल्कुल नही सोया|

समझ गया था की जाग कर सोचने से कुछ नही होगा, उठना पड़ेगा, कुछ करना पड़ेगा| सिर्फ़ आशा करने से कुछ नही होगा, आक्षन से बहुत कुछ होने की गुंजाइश होगी|

मेरी एजुकेशन की कमी को मैने किनारा किया, और कुछ भी करने को मैं तयार हो गया… मैने सोच लिया था, कोई भी कंपनी, कोई भी नौकरी, कुछ भी कर लूँगा, बस काम करना है| और सच कहता हूँ… मुझे अपने लिए काम करना था, किसी को ग़लत साबित करने के लिए नही| एक चीज़ जो बिल्कुल क्लियर थी, की हिम्मत नही हारनी है और ज़िद्द नही छोड़नी है| शायद, यही ज़िद्द मेरे काम आई और मुझे एक नई कंपनी मे सेल्समन की नौकरी मिल गयी| और शुरू हुआ सिलसिला मेहनत का, सीखने को और अपनी नीयत साफ़ रखने का क्योंकि ज़िद्द पक्की थी, इस लिए मैं जाता रहा और अपने आप से सिर्फ़ एक वादा किया, सीखना नही छोड़ना है… रोज़ सीखूंगा और रोज़ सिखाऊँगा|

आज मैं गर्व से कह सकता हूँ की आजकल मैं इंग्लीश लैंग्वेज सीख रहा हूँ, क्योंकि मैं सीनियर पोज़िशन पे काम करता हूँ| तुजुर्बे के दम पे यहाँ तक पहुँचा हूँ ज़िद्द है की कोई वजह बनाने दूँगा अभी और आगे बढ़ने के लिए|

क्या है आपकी कहानी ज़िद्द की ? हमें बताएँ   +91-8448983000