neelam
  • 13th Dec 18

  • By Neelam Wadehra

सुना था कि मंज़िलें बड़ी ज़िद्दी होती हैं,परंतु मेरा अनुभव है कि अगर हमारे इरादे ज़िद्दी हों तो हर मंज़िल आसान हो जाती है। खुद पर विश्वास और कर्म में हो आस्था, तो फिर मंज़िलें कितनी भी ज़िद्दी हों ,मिल ही जाता है रास्ता ।

मेरी कहानी ज़िद्द की सन् 2000 की है, इस वर्ष की शुरुआत में ,मैंने एक ज़िद्द् पकड़ी कि मुझे अब और नौकरी नहीं करनी,( मैं बैंक में कार्यरत थी ) , अंतरआत्मा की आवाज़ थी कि मुझे अब समाज सेवा करनी है, और यह भाव धीरे- धीरे ज़िद्द में बदल गया, लेकिन उस समय परिवार की ज़रुरतें कुछ ऐसी थीं कि नौकरी छोड़ पाना सम्भव नहीं था । कहते हैं ना कि यदि आप कुछ शिद्दत यानि सच्चे दिल से चाहते हैं,तो पूरी कायनात आपका साथ देती है,मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ । एक दिन अचानक पता लगा कि बैंको में अतिरिक्त लाभ के साथ स्वर्णिम स्वैछिक सेवा निवृत्ति (golden handshake voluntary retirement) की योजना लागू हो रही है । इस योजना से मुझे सच में अपनी ज़िद्द पूरी करने का स्वर्णिम अवसर मिला । बस फिर क्या,मैंने घर आकर अपना फैसला सुना दिया कि मैं नौकरी छोड़ कर, अब समाज सेवा में अपना सहयोग करना चाहती हूँ । मेरी ज़िद्द के आगे सब नतमस्तक, बस मुझे इतनी चेतावनी अवश्य दी ,फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखना, और सेवा भाव से इस कार्य में जुड़ना । और सच मानिए समाज सेवा के क्षेत्र में काम करते हुए ,इन 17 वर्षों में जो ज़िदगी मैंने जी, असली ज़िंदगी वही है, बाकी तो सब कैलंडर की तारीखें थीं । "जीवन भरा हो वर्षों से, या हर वर्ष भरा हो जीवन से " इन पंक्तियों का अर्थ समझ आया नेत्रहीन बच्चों के लिए काम करके, उनकी किताबें रिकार्ड करके, उनके कॉलेज की परीक्षाओं की तैयारी में मदद करके, उनके साथ समय बिता कर । उनमें शारीरिक कमी के बावजूद भरपूर आत्मविश्वास के साथ जीने की कला, मैंने उनसे सीखी । फिर वर्ष 2002 में दिल्ली लाफ्टर के साथ जुड़ कर, सच में मेरी ज़िंदगी बदल गई और अपनी जिद्द पूरी करने का पूरा अवसर मिला । तब से मैंने अपनी ज़िंदगी का मिशन बना लिया कि,-----

"चलो चोरी से रख आते हैं, हँसी खुशी के लम्हे उनके सिरहाने, जिन्हे मुद्दे हो गई हैं, खुलकर मुस्कराये ।"

“कैंसर जैसी बीमारी से जूझते हुए, रोगियों के साथ लाफ्टर थैरेपी के सैशन में जो सुखद अनुभव होता है, तो लगता है कि ज़िद्द अच्छी थी ।” ज़िंदगी के किसी भी क्षेत्र में, स्कूल,कॉलेज, अस्पताल ,मल्टीनैशनल कंपनियाँ ,यहाँ तक कि तिहाड़ जेल के कैदियों के लिए,जहाँ भी, तनाव, निराशा,या नैगिटिव भावनाओं की संभावना लगती है, वहाँ हास्य - योग के सैशन लगाकर, उन्हें ज़िदगी जीने की नई दिशा देकर एक अद्भुत संतुष्टि का अनुभव होता है। इसके अतिरिक्त हास्य- योग एक अद्भुत स्वास्थ्य प्रदायक विधा के रूप में, प्रतिदिन विभिन्न पार्कों में प्रातः लोगों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना , इन सब कामों को करते हुए मुझे अपनी ज़िद्द पर आज गर्व है । एक इंटरव्यू के दौरान मुझसे पूछा गया कि आपका प्रोफैशन क्या है ? मेरा उत्तर था---

"हर मायूस चेहरे पर,हँसी लाने का कारोबार है अपना, खरीद लेते हैं, दिलो के दर्द को, यही रोज़गार है अपना ।"

ज़िद्द ही सही, पर जब इस से समाज में हम कुछ सकारात्मक बदलाव ला पायें , तो ज़िद्द भी अच्छी होती है ।

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