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roopa
  • 13th Dec 18

  • By Roopa Sharma

मेरा नाम रूपा शर्मा है और ये है मेरी कहानी ज़िद्द की।

सबकी ज़िन्दगी की तरह मेरी भी एक आम ज़िन्दगी थी। सरकारी नौकरी, पति एक आला दर्ज़े के अफसर और एक छोटा सा बेटा। सब खुशहाल ही था।

फिर सन 1998 में मेरे पति दिल के दौरे की वजह से स्वर्ग सिधार गए। हमें कभी नहीं लगा की उन्हें दिल का दौरा भी आ सकता है।

रोज़ सुबह उठ के योग करना उनकी आदत थी पर कुछ दिनों से परेशान से ज़रूर थे। उनका रुतबा ही इतना था की आते जाते सब नमस्ते सलाम ज़रूर करते थे।

हम ये कभी समझ ही नहीं पाए की ऐसी कौनसी परेशानी उन्हें अंदर ही अंदर से खा गयी.

उनके गुज़रते ही जो परिवार वाले , जो की हमे लगा था सहारा बनेगे, वो हमारे ही दुश्मन बन चले. घर के अलमारी में से कागज़ कुछ यूँ गायब हुए की हमें पता ही नहीं चल पाया.

देखते ही देखते मौके का फ़ायदा उठाने वाले कई आ गए और हमें पता भी नहीं चला| मेरे लिए एक छोटे बच्चे के साथ अकेले रहना मुश्किल हो रहा था| समझ में नहीं आ रहा था की घर संभालें या ऑफिस।

फिर मैंने अपनी बड़ी दीदी को अपने साथ ही रहने के लिए बुला लिया। वो भी विधवा थी। कुछ समय बाद मुझे धमकिया आने लगी। इन सब बातों के साथ मुझे सरकारी मकान को खाली भी करना था। एक साल बाद मैंने अपने बेटे को हॉस्टल डाल दिया और नौकरी के साथ साथ कोर्ट केस भी लड़ती रही। केस चलता रहा, वक़्त गुज़रता रहा। मैं रोहिणी में शिफ्ट हो गयी और वहाँ पर मकान भी ले लिया। बेटा दसवीं पार करने के बाद घर आ गया।

उसके घर आने के बाद जैसे घर में वापस रौनक आ गयी। 5 साल हो गए और केस चलता रहा। ज़िन्दगी ऑफिस से कोर्ट और कोर्ट से ऑफिस के बीच ही कट रही थी पर मैंने हार नहीं मानी। ये ज़िद्द मेरे लिए नहीं, पर मेरे बेटे के हक़ की थी और उसे हक़ दिलाये बिना हार जाना मुझे मंज़ूर नहीं था। 2 साल बाद फिर मैंने अपने बेटे को इन सब बातों से दूर देहरादून भेज दिया। वो 4 साल वहां अकेला ही रहा। कोर्ट और ऑफिस से वक़्त निकल के मैं तब भी कभी कभी उस से मिलने पोहोच जाया करती थी। 4 साल बाद वो वापस दिल्ली आ गया एम.बी.ए करने के लिए।

अपने बेटे के हक़ की ज़िद्द के लिए लड़ते हुए मुझे अब 12 साल हो चुके थे। पर अब आखिर केस फैसले की कगार पे था। इन सब के बीच मैंने असिस्टेंट डायरेक्टर की उपाधि भी पा ली थी।

आज भी मुझ वो पल याद करते हुए ख़ुशी मिलता है जब 2012 में हम उस घर में शिफ्ट हुए जिसका असल हक़दार मेरा बेटा था। केस हमारे हक़ में हो चुका था और मेरी 14 साल की ज़िद्द के बाद हम अपने घर में थे।

14 साल लगे मुझे इस ज़िद्द को पूरा करने में| 14 साल मैं अकेले ही लड़ती रही। पर ज़िन्द्दगी न तब मुझे तोड़ पायी और न ही आज। आज भी मैं लड़ने के लिए वैसे ही तैयार हूँ जैसे 20 साल पहले थी।

ये है मेरी कहानी ज़िद्द की।

क्या है आपकी कहानी ज़िद्द की ? हमें बताएँ   +91-8448983000